श्रीगोस्वामी हवेली स्थान पर श्रीदीपकजी स्वरुप विराजमान गोस्वामी श्रीगोपीनाथजी महाराज गोस्वामी हवेली स्थान पर विराजमान श्रीगोपीनाथजी के दीपकजी समस्त वैष्णव सृष्टि एवं धर्मप्रेमी व्यक्तियों के लिए श्रद्धा के केन्द्र स्वरूप है। पुष्टिमार्गीय वैष्णवजन यह अखंडज्योतिर्मय स्वरूप श्रीगोपीनाथजी के दीपकजी के शरण जाकर अपने चिंता आदि क्लेश के परित्याग द्वारा निश्चिंत रूप श्रीप्रभुसेवा की सन्मुखता साधते हैं। गोस्वामी हवेली (राजनगर) अहमदाबाद स्थान पर यह श्रीदीपकजी २०० वर्ष से भी अधिक समय से विराजमान है। गोस्वामी हवेली स्थान पर विराजमान यह श्रीदीपकजी गोस्वामी श्रीगोपीनाथजी महाराज द्वारा सिद्ध है। गोस्वामी श्रीगोपीनाथजी महाराज श्रीवल्लभाचार्यजी के वंश अंतर्गत महाप्रतापी आचार्य के रूप में विख्यात है। आपश्री श्रीमहाप्रभुजी के पुत्र श्रीगुसाईंजी श्रीविठ्ठलनाथजी के प्रथम पुत्र श्रीगिरिधरजी के वंश में पुष्टिमार्गीय प्रथम गृह अंतर्गत प्रकट हुए है। आपश्री का प्राकट्य प्रथम गृहनिधि श्रीनटवर प्रभु के गृह तरीके विख्यात वंशशाखा में गोस्वामी श्रीरघुनाथजी महाराज के गृह संवत. १८३१ आश्विन कृष्ण १ के शुभदिन राजस्थान के जोधपुर नगर में हुआ। आपश्री के परंपरागत सेव्य स्वरूप श्रीनटवर प्रभु उस समय जोधपुर में विराजते थे। राजकीय कारणों से प्रभुसुखार्थ आपश्री के पिताश्री श्रीरघुनाथजी महाराज श्रीनटवरप्रभु को संवत. १८५१ में अहमदाबाद पधराकर लाये तथा सहपरिवार अहमदाबाद में गोस्वामी हवेली स्थान पर स्थायी मुकाम किया। इतिहास में प्रसिद्ध है अहमदाबाद के मुस्लिम सुबा ने श्रीनटवर प्रभु का माहात्म्य जानकर श्रीनटवर प्रभु को अहमदाबाद पधराकर लाने की बिनती की तथा सर्वप्रकार की राजकीय सहायता देने की खातरी दी थी, उस अंतर्गत श्रीनटवरप्रभु मंदिर को २८ गाँव तथा महेसुली आवक का छटका हिस्सा मंदिर के निभाव अर्थ से बांधकर दिया। श्रीरघुनाथजी महाराज की उत्तम आचार्यपरंपरा आपश्री के प्रथम पुत्र गोस्वामी श्रीगोपीनाथजी ने चालु रखी। आपश्री प्रारंभ से ही अत्यंत तेजस्वी एवं विदुषी थे। सदा भगवन्नाम में ही प्रवृत्त रहते थे। किसी एक समय आपश्री ने श्रीनटवर प्रभु के शैय्यामंदिर के दीपकजी सन्मुख अनुष्ठान प्रारंभ किया। जिसके फलस्वरूप श्रीगुसाईंजी के द्वारा श्रीगिरिधरजी को दान की हुई अमृतचिरंजीवी विद्या श्रीगोपीनाथजी को सिद्ध हुई। यह सिद्धि प्राप्त होने से श्रीदीपकजी में से काजल के स्थान पर कुमकुम प्रकट हुआ। इस अलौकिक कुमकुम से आपश्री का आचार्यतिलक हुआ तथा श्रीनटवर प्रभु का गृह श्रीगोपीनाथजी ज्योतिष्पीठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आपश्री ने यह अलौकिक दीपकजी को अखंड प्रज्ज्वलित रखा, इस अखंड श्रीदीपकजी के दर्शन आज भी गोस्वामी हवेली स्थान पर होते हैं। आपश्री ने श्रीदीपकजी सन्मुख श्रीनटवरप्रभु की स्तुति श्रीनटवराष्टक की रचना की है। इसके उपरांत आपश्री ने श्रीमथुरेशाष्टक की भी रचना की है। आपश्री के बेटीजी ने इस श्रीदीपकजी में से अन्य दीपकजी प्रकटाकर उनकी स्थापना मुलतान में की थी। पाकिस्तान की रचना होने के बाद यह दीपकजी गोकुल पधारे तथा वहाँ से गोस्वामी हवेली स्थान पर परत पधारे। यह दूसरे श्रीदीपकजी भी गोस्वामी हवेली के परिसर में विराजते है। श्रीगोपीनाथजी के समय में अहमदाबाद में सत्ता परिवर्तन होने से अहमदाबाद गायकवाड सरकार के आधिपत्य में आया। उस समय गायकवाड के दीवान श्रीनटवर प्रभु के दर्शन के लिए आये तथा आपश्री के तेज से अत्यंत प्रभावित होकर मंदिर को मुस्लिम सुबा के द्वारा अर्पण किये हुए विशेष अधिकारो को सुरक्षित रखा। बाद में जब गायकवाड सरकार अंग्रेज सरकार के शरण गये तब उनकी दरम्यानगिरि से अंग्रेज सरकार ने भी श्रीनटवर प्रभु मंदिर को दीये विशेष अधिकारो को मान्य रखा। आपश्री के तीन पुत्र भगवद् इच्छा से कम आयु में ही लीला में पधारे थे, इसलिए आपश्री को प्राप्त हुई विशेष अमृतसंजीवनी विद्या का दान अपने अत्यंत प्रिय छोटे भाई श्रीव्रजभूषणजी - श्रीछोटाजी महाराज को किया था। श्रीछोटाजी महाराज का प्राकट्य संवत. १८३८ में जोधपुर में हुआ था। आपश्री का माहात्म्य भी अत्यंत प्रकट था। आपश्री के देशभर में लाखो सेवक थे उसमें से अनेक राजा, महाराजा, उच्चाधिकारी तथा संत-महानुभावो का भी समावेश होता है। प्रसिद्ध गुजराती कवि दयारामजी भी आपश्री के सेवक थे। दयारामजी को पुष्टि भक्तिमार्ग का उपदेश देनेवाले विख्यात महानुभव इच्छारामभट्टजी भी आपश्री के अतुलित माहात्म्य से प्रभावित थे। यह भट्टजी के उपदेशात्मक ग्रंथो में देखने को मिलता है। श्रीगोपीनाथजी के लीलागमन बाद श्रीछोटाजी महाराज श्रीगोपीनाथजी ज्योतिष्पीठ के आचार्यपद पर विराजे। आपश्री ने संवत. १८९४ में श्रीनटवर प्रभु का भव्य छप्पनभोग मनोरथ किया। गुजरातमें छप्पनभोग महोत्सव का यह सर्वप्रथम प्रसंग था। गोस्वामी हवेली स्थान पर आयोजित यह छप्पनभोग के दर्शनार्थ देशदेशावर से लाखों वैष्णव उमट आये थे। उस समय ज्यादा भीड एकत्रित होने के कारण सात वैष्णव दर्शनार्थी की भीड में कुचल कर मृत्यु हुई। सुंदर महोत्सव के स्थान पर यह अमंगल घटना होने से श्रीप्रभु के महोत्सव का आनंद क्लेश में परिवर्तित न हो इस हेतु से आपश्री ने अपने ज्येष्ठ भाई के द्वारा प्राप्त अमृतसंजीवनी विद्या का प्रयोग श्रीगोपीनाथजी के दीपकजी के सन्मुख विराजकर किया तथा उसके द्वारा सातों वैष्णवों को पुनर्जीवित किया। इस माहात्म्य का प्रसंग पुष्टिमार्ग के अनेक इतिहास में लिखा हुआ है। इस प्रकार प्रकट माहात्म्य दिखाने से आपश्री की महिमा खूब बढती देखकर आपश्रीने विचार किया की इस प्रसिद्धि श्रीप्रभु सेवा-स्मरण में बाधा उतपन्न करेगी। इसलिए फिर से कभी जाहेर में अमृतसंजीवनी विद्या का उपयोग न करने का संकल्प लिया। आपश्री के वंश में इस विद्या का दान करते समय यह नियम आवश्यक किया। आपश्री की वंशपरंपरा में अनेक आचार्यो ने अनेक स्थान पर भगवद् सेवा में आनेवाले अमंगल दूर करने तथा अनुकंपा से प्रेरित होकर इस सिद्धि का उपयोग परोक्ष में अनेक बार किया है। यह दोनों आचार्यभ्राताओं की श्रीगादीजी के दर्शन गोस्वामी हवेली स्थान पर होते है। गोस्वामी हवेली स्थान पर विराजते श्रीदीपकजी अभी श्रीगोपीनाथजी ज्योतिष्पीठाधीश्वर १०८ श्रीव्रजनाथजी महाराजश्री के शिर पर विराजते है। अगाऊ के पूर्व आचार्यों के समय में यह श्रीदीपकजी आचार्यश्री के निजनिवासस्थान में विराजते थे, वह केवल गोस्वामी आचार्यो तथा सन्निष्ठ वैष्णवों को ही गादीपति आचार्यश्री की आज्ञा से दर्शन होते थे। जो श्रीआचार्यमानो की कृपा से अब सर्व वैष्णवों को दर्शन हो सके उस प्रकार विराजते है। अनेक वैष्णव तथा अन्य धर्मों के लोग भी यह श्रीदीपकजी का अत्यंत माहात्म्य जानकर श्रीदीपकजी पर अतूट श्रद्धा धराते है। ।।श्रीगोपीनाथजी सदा सहाय।।

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